
आपकी स्क्रीन पर क्या दिखेगा, कौन तय करता है? सोशल मीडिया के ‘अदृश्य खेल’ पर सरकार सख्त, Meta से एल्गोरिदम का मांगा हिसाब
फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कौन-सी पोस्ट ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी और कौन-सी पीछे रह जाएगी—सोशल मीडिया के इसी एल्गोरिदम को लेकर केंद्र सरकार की चिंता बढ़ी है। Meta की वैश्विक टीम से एल्गोरिदम और कंटेंट मॉडरेशन की कार्यप्रणाली समझी जा रही है। राजनीतिक और संवेदनशील कंटेंट, डीपफेक तथा बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री जैसे मामलों में सरकार ने केवल AI पर निर्भर रहने के बजाय मानव निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया है।

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टेक्नोलॉजी | सोशल मीडिया |आप सुबह फोन खोलते हैं। एक वीडियो देखते हैं, दूसरे पर कुछ सेकंड ज्यादा रुकते हैं, तीसरी पोस्ट लाइक कर देते हैं... और यहीं से सोशल मीडिया आपकी पसंद पढ़ना शुरू कर देता है। कुछ समय बाद आपकी स्क्रीन पर उसी तरह के वीडियो, पोस्ट और विचार बार-बार दिखाई देने लगते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—आप सोशल मीडिया पर क्या देख रहे हैं, उसमें आपकी पसंद कितनी है और प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम की भूमिका कितनी?
यही सवाल अब केंद्र सरकार के स्तर पर उठ रहा है। फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म चलाने वाली Meta की वैश्विक टीम के साथ एल्गोरिदम और कंटेंट मॉडरेशन की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा की जानकारी सामने आई है।
मुद्दा केवल फेक न्यूज या डीपफेक हटाने तक सीमित नहीं है। चिंता उस तकनीकी व्यवस्था की भी है, जो करोड़ों यूजर्स के सामने कंटेंट की प्राथमिकता तय करती है।
सरकार जानना चाहती है—कंटेंट को ऊपर-नीचे करने का आधार क्या है?
सोशल मीडिया का Recommendation System हर यूजर के लिए अलग फीड तैयार करता है।
सरकार की दिलचस्पी इस बात को समझने में है कि किसी पोस्ट, वीडियो या राजनीतिक-सामाजिक मुद्दे से जुड़े कंटेंट की पहुंच किन संकेतों के आधार पर बढ़ती या घटती है।
इसमें यूजर का व्यवहार, एंगेजमेंट, कंटेंट की प्रकृति, प्लेटफॉर्म की नीतियां और दूसरे तकनीकी संकेत भूमिका निभा सकते हैं।
सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस पोस्ट को एल्गोरिदम अधिक लोगों तक पहुंचाता है, उसका प्रभाव भी कई गुना बढ़ सकता है।
एल्गोरिदम आपकी पसंद कैसे पकड़ता है?
इसे आसान तरीके से समझें तो सोशल मीडिया पर आपकी लगभग हर गतिविधि प्लेटफॉर्म को आपकी रुचि का संकेत देती है।
चरण | क्या होता है |
|---|---|
1. आपकी रुचि समझी जाती है | आप क्या देखते हैं, कहां रुकते हैं और किससे इंटरैक्ट करते हैं |
2. मिलता-जुलता कंटेंट आता है | आपकी पसंद के आधार पर दूसरी पोस्ट सुझाई जाती हैं |
3. एंगेजमेंट महत्वपूर्ण बनता है | लोकप्रिय और प्रासंगिक समझे गए कंटेंट की पहुंच बढ़ सकती है |
4. फीड लगातार व्यक्तिगत होती है | आपकी पुरानी गतिविधियों से अगली सिफारिशें प्रभावित होती हैं |
5. एक जैसा कंटेंट बार-बार दिख सकता है | इससे यूजर सीमित प्रकार के विचारों या सूचनाओं के ज्यादा संपर्क में आ सकता है |
हालांकि इसे यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्थिति में एल्गोरिदम जानबूझकर किसी एक राजनीतिक ‘नैरेटिव’ को बढ़ाता और विरोधी विचारों को रोकता है। ऐसा दावा साबित करने के लिए संबंधित प्लेटफॉर्म और मामले के तकनीकी प्रमाण जरूरी होंगे।
फेक ट्रेंड भी बड़ी चुनौती
चिंता का दूसरा हिस्सा बॉट और फर्जी अकाउंट हैं।
यदि बड़ी संख्या में अकाउंट एक ही हैशटैग, वीडियो या संदेश को बेहद कम समय में आगे बढ़ाते हैं, तो किसी मुद्दे को वास्तविक लोकप्रियता से ज्यादा बड़ा दिखाने की कोशिश की जा सकती है।
आम यूजर के लिए यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि स्क्रीन पर दिख रहा ट्रेंड वास्तव में हजारों स्वतंत्र लोगों की प्रतिक्रिया है या किसी समन्वित नेटवर्क की गतिविधि।
इसीलिए सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंड कर रहा है’ का अर्थ हमेशा ‘यही जनमत है’ नहीं होता।
राजनीतिक कंटेंट पर सिर्फ AI काफी नहीं?
संवेदनशील सामग्री की मॉडरेशन प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के सामने Meta के अधिकारियों ने अपनी व्यवस्था को लेकर प्रेजेंटेशन दिया।
सरकार की तरफ से राजनीतिक मुद्दों, विरोध-प्रदर्शनों, डीपफेक और CSAM (Child Sexual Abuse Material) जैसी अत्यंत संवेदनशील श्रेणियों में केवल ऑटोमेटेड या AI आधारित निर्णयों पर निर्भरता को लेकर चिंता जताई गई है।
ऐसे मामलों में अधिक मानवीय समीक्षा (Human Review) पर जोर देने की बात सामने आई है।
क्यों मुश्किल है एल्गोरिदम की पूरी परत खोलना?
सोशल मीडिया कंपनियों के Recommendation Algorithms बेहद जटिल होते हैं। ये लगातार बदलते भी रहते हैं और इनके कई तकनीकी हिस्से कंपनियों की आंतरिक प्रणालियों से जुड़े होते हैं।
यही वजह है कि बाहर बैठे किसी व्यक्ति के लिए यह जानना आसान नहीं कि उसकी फीड में कोई खास पोस्ट क्यों आई और दूसरी क्यों नहीं।
एल्गोरिदमिक पारदर्शिता की बहस का मूल सवाल भी यही है—क्या यूजर को यह जानने का पर्याप्त अधिकार होना चाहिए कि उसकी स्क्रीन पर किसी सामग्री को प्राथमिकता क्यों दी गई?
Telegram फाउंडर ने उठाया अलग साइबर खतरे का मुद्दा
इसी बीच Telegram के संस्थापक पावेल दुरोव ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े एक अलग खतरे को लेकर चेतावनी दी है, जिसे उन्होंने ‘Takedown Extortion’ कहा है।
दुरोव के मुताबिक इसमें किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या समुदाय पर दबाव बनाकर उसे ऐप स्टोर से हटवाने जैसी कोशिश की जा सकती है।
उन्होंने यह दावा भी किया कि Apple ने हाल में Telegram को कुछ समय के लिए ऐप स्टोर से हटाया था और बाद में उसे बहाल किया गया। इस दावे को संबंधित कंपनियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया के संदर्भ में अलग से देखना जरूरी है।
असल लड़ाई फेक न्यूज से आगे निकल चुकी है
सोशल मीडिया की चुनौती अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि कोई खबर सही है या फर्जी।
अब सवाल यह भी है कि कौन-सी सूचना करोड़ों लोगों तक पहुंचेगी, कौन-सी तेजी से वायरल होगी और किस आधार पर कोई पोस्ट आपकी स्क्रीन पर बार-बार दिखाई देगी।
सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच एल्गोरिदम को लेकर चल रही चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका संबंध सीधे डिजिटल पारदर्शिता, अभिव्यक्ति, ऑनलाइन सुरक्षा और करोड़ों यूजर्स तक पहुंचने वाली सूचनाओं से है।
और यही इस बहस का सबसे बड़ा सवाल है—स्क्रीन आपकी है, लेकिन उस पर क्या दिखाई देगा, उसका नियंत्रण आखिर कितना आपके हाथ में है?


